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चौहान और लक्ष्य

निकल पड़ा चौहान 
तलवार उठा दम खाने को
सिर पर सजा है कफन
इस मिट्टी में मिल जाने को।


नेत्र उसके अब रहे नहीं
इस जग को दिख जाने को
हाथों में मजबूती फिर भी
इस मिट्टी में मिल जाने को।

तन पर वस्त्र विदेशी अब तो
देशी ये देह बस, कह जाने को
देशप्रेम अब भी वैसा है उसका
इस मिट्टी में मिल जाने को।

शत्रु सम्मुख बैठा है सिंहासन 
सम्पूर्ण देश पर छा जाने को
आशा बस एक बेड़ी में अब तो
इस मिट्टी में मिल जाने को।

कैसे रोके चौहान शत्रु को
लौह वस्त्र हैं रुक जाने को
बाहें फिर भी फड़क रहीं हैं
इस मिट्टी में मिल जाने को।

ये अंतिम प्रतियोगिता है जीवन की
असंभव है दिखलाने को
मन में ठानी है फिर भी चौहान ने
इस मिट्टी में मिल जाने को।

बेड़ियाँ तन से उतर गयीं हैं
मुक्त उसे कर जाने को
चौहान अब भी खड़ा हुआ है
इस मिट्टी में मिल जाने को।

धनुष एक काष्ठ बाण दिया गया है
चौहान को कुछ कर दिखलाने को
धनुष भी थर थर काँप रहा है
इस मिट्टी में मिल जाने को।

प्रत्यंचा पूरी खिंच चुकी है
सम्मुख एक पात्र को भेद जाने को
चौहान का लेकिन एक अलग लक्ष्य है
इस मिट्टी में मिल जाने को।

एक संकेत अपने सहयोगी का
एकमात्र अवसर है धरा का कर्ज चुकाने को
चौहान का हृदय स्पंदित धक धक
इस मिट्टी में मिल जाने को।

वायु अवरोध हटा रही है खुद ही
बाण लगा लक्ष्य भेद जाने को
चहुँ दिशाएँ देख रही हैं अवसर
इस मिट्टी में मिल जाने को।

रक्त गिर रहा सिंहासन से टप टप
हर्ष सहयोगी का दिख जाने को
चौहान अब तैयार खड़ा है
इस मिट्टी में मिल जाने को।

तलवार चली, शिरोधरा खण्डित
चौहान मिल चुका मिट्टी में अब तो
चंदर खुश है अब मृत्यु से अपनी
इस मिट्टी में मिल जाने को।

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4 Comments

वाह लाजवाब लाजवाब बहुत ही सजीव वर्णन

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kapil sharma

02-May-2021 09:06 AM

👍👍👍

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Shaba

02-May-2021 12:15 AM

ओए से भरी कविता।

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